व्यौहार राजेन्द्र सिंह (14 सितम्बर 1900 – 02 मार्च 1988 जबलपुर, मध्यप्रदेश)हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार थे जिन्होने हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने की दिशा में अतिमहत्वपूर्ण योगदान दिया। फलस्वरूप उनके ५०वें जन्मदिन के दिन ही, अर्थात 14 सितम्बर 1949 को, हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। पचासवें जन्मदिन पर उपहार स्वरुप यह शुभ-समाचार दिल्ली से सबसे पहले जबलपुर के तत्कालीन सांसद सेठ गोविन्द दास जी ने भेजा क्योंकि इस विशेष दिन को ही राजभाषा-विषयक निर्णय लिए जाने के लिए उन्होंने प्रयास किये थे।

आज जयपुर मे राजस्थान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति जयपुर द्वारा हिंदी भाषा के प्रचार व प्रसार के लिए आयोजित गोष्ठी में अखिल भारतीय कायस्थ महासभा राजस्थान के महामंत्री धर्मेन्द्र जोहरी (जो कि राजस्थान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति जयपुर के कार्यकारी सदस्य भी है) व जयपुर जिला अध्यक्ष अरुण कुमार सक्सेना ने भाग लिया |

यद्यपि व्यौहार राजेन्द्र सिंह का संस्कृत, बांग्ला, मराठी, गुजराती, मलयालम, उर्दू, अंग्रेज़ी आदि पर भी बहुत अच्छा अधिकार था परन्तु फिर भी हिंदी को ही राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए। इसके चलते उन्होंने दक्षिण भारत की कई यात्राएं भी कीं और लोगों को मनाया ।
व्यौहार राजेन्द्र सिंह अखिल भारतीय चरखा संघ, नागरी प्रचारिणी सभा, हरिजन सेवक संघ, नागरिक सहकारी बैंक, भूदान यज्ञ मण्डल, हिंदी साहित्य सम्मलेन, सर्वोदय न्यास, कायस्थ महासभा, चित्रगुप्त सभा जैसी अनेकों संस्थाओं के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष रहे। उन्होंने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व सर्वधर्म सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व किया जहां उन्होंने सर्वधर्म सभा में हिन्दी में ही भाषण दिया जिसकी जमकर तारीफ हुई।

व्यौहार राजेन्द्र सिंह तथा राजरानी देवी के व्यक्तिगत निमंत्रण पर जबलपुर के वर्तमान हनुमानताल वार्ड स्थित व्यौहारनिवास-पैलेस (स्थानीय भाषा में “व्यौहार-राजवाडा” या “बखरी”) में महात्मा गाँधी लगभग एक सप्ताह तक रहे । साथ में आचार्य जीवतराम कृपलानी, मौलाना अबुलकलाम आज़ाद, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, एडिथ एलेन ग्रे, सरोजिनी नायडू, सर सैयद महमूद, वीर खुरशेद नरीमन, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी, जमनालाल बजाज, मीरा बहन व अन्य थे। इस अवसर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी की बैठक भी उसी व्यौहारनिवास-पैलेस में हुई थी। यरवदा जेल में कारासेवन के कारण कस्तूरबा नहीं आ सकीं। व्यौहारनिवास-पैलेस के जिस दक्षिण-पूर्वी हिस्से में ये सब रहे कालान्तर में उसका नामकरण ही “गांधी मंदिर” कर दिया था।

